Uttarakhand News 20 June 2026: नगर निगम हरिद्वार के बहुचर्चित भूमि खरीद घोटाले में बड़े अधिकारियों पर कार्रवाई की तलवार चल चुकी है, लेकिन इस पूरे प्रकरण का एक ऐसा पक्ष भी है जो अब तक अनुत्तरित है।
सवाल यह है कि जिस भूमि के उपयोग परिवर्तन (लैंड यूज चेंज) से लेकर खरीद-बिक्री की पूरी प्रक्रिया में तहसील और राजस्व विभाग की अहम भूमिका रही, वहां कुछ महत्वपूर्ण जिम्मेदार अधिकारी जांच और कार्रवाई की जद से बाहर कैसे रह गए।
54 करोड़ रुपये खर्च कर खरीदी थी जमीन
अक्टूबर-नवंबर 2024 को सराय क्षेत्र में खरीदी गई 33 बीघा भूमि का मामला शुरू से ही कई संदेहों को जन्म देता रहा है। नगर निगम ने डंपिंग यार्ड के विस्तार की योजना के नाम पर करीब 54 करोड़ रुपये खर्च कर यह भूमि खरीदी, जबकि स्थानीय स्तर पर भूमि के वास्तविक बाजार मूल्य को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार इस क्षेत्र में भूमि उपजाऊ न होने के कारण किसान भूमि दान देने के लिए भी तैयार थे। परंतु उसके बाद भी नगर निगम ने कौड़ी की भूमि करोड़ों में खरीदी। इस भूमि खरीद में सबसे अधिक चर्चा उस प्रक्रिया की हुई, जिसमें लगभग 25 बीघा भूमि का उपयोग कृषि से अकृषि में बदला गया।
राजस्व जानकारों के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में भूमि उपयोग परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी होने में कई सप्ताह से लेकर तीन माह तक का समय लग जाता है। परंतु इस मामले में महज 14 दिनों के भीतर कृषि भूमि को अकृषि घोषित कर दिया गया। इतनी असाधारण तेजी ने शुरुआत से ही पूरे प्रकरण को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया।
इसमें दिलचस्प तथ्य यह भी है कि भूमि उपयोग परिवर्तन के दौरान तैयार की गई राजस्व अभिलेखों की फाइलों में कई नियम और शर्तें दर्ज की गई थीं। इसके बावजूद भूमि की खरीद-बिक्री और पंजीकरण प्रक्रिया में उन्हीं नियमों की अनदेखी किए जाने के आरोप सामने आए।
भूमि बेचने वाले तीन किसानों में से एक की बीमारी के चलते मृत्यु भी हो चुकी है। इस भूमि खरीद मामले में महत्वपूर्ण पात्रों क्षेत्रीय रजिस्ट्रार कानूनगो, लेखपाल और तहसीलदार की भूमिका को लेकर सवाल उठे हैं। । भूमि उपयोग परिवर्तन, सीमांकन, अभिलेख सत्यापन और खरीद-बिक्री की प्रक्रियाओं की जिम्मेदारी इन्हीं अधिकारियों के पास होती हैं।
96 लाख रुपये की स्टाम्प ड्यूटी पर उठे सवाल
हरिद्वार : मामले में एक और महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि जिस भूमि का उपयोग कृषि से अकृषि में परिवर्तित किया गया, उसके बाद उससे जुड़े राजस्व और मूल्यांकन संबंधी नियमों का पालन होना चाहिए था। परंतु आरोप हैं कि खरीद-बिक्री के दौरान कई स्तरों पर प्रक्रियागत विसंगतियां सामने आईं।
इतना ही नहीं, इससे सटी करीब आठ बीघा कृषि भूमि को भी अकृषि भूमि की दरों पर खरीद लिया गया। स्टाम्प शुल्क निर्धारण को लेकर भी गंभीर सवाल उठे और करीब 96 लाख रुपये की स्टाम्प ड्यूटी के संबंध में अनियमितता के आरोप लगे।










