Uttarakhand News 24 Sep 2026: हल्द्वानी। कुमाऊं का प्रवेश द्वार हल्द्वानी विकास की दौड़ में शुरुआत से ही आगे रहा है। मंडल में कारोबार और परिवहन सुविधाओं के विस्तार की बात हो या शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं का विकास, हल्द्वानी हमेशा से प्रत्येक क्षेत्र में अग्र पंक्ति में ही रहा है। यहां के कई ऐतिहासिक किस्से हैं, तो वहीं बाजार की गलियों की अपनी कुछ खास कहानी है।
दैनिक जागरण आपके लिए ऐसे ही सुनी और अनसुनी कहानियों की श्रृंखला शुरू कर रहा है। जिसमें इतिहास संग वर्तमान को बताती कहानियां परोसी जाएंगी। रोजाना कुछ नया और रोचक मिलेगा। बुधवार से शिक्षा क्षेत्र के साथ इस कड़ी की शुरुआत की जा रही है। अखबार के अलावा डिजिटल प्लेटफार्म पर वीडियो सामग्री प्रस्तुत की जाएगी।
आज शिक्षा प्राप्त करना बेहद सुलभ है। सरकारी और निजी स्कूलों की भरमार है। उच्च शिक्षा के लिए भी संस्थानों के कई विकल्प उपलब्ध हैं। लेकिन, एक दौर था जब शिक्षा के लिए आज जैसी सुविधाएं नहीं थीं। गिने-चुने स्कूल होते थे और वो भी कई किलोमीटर दूर। उच्च शिक्षा के लिए तो बड़े नगरों का रुख करना पड़ता था। इन सब कठिनाइयों के बीच कुमाऊं के प्रवेश द्वार हल्द्वानी में लाला बाबू राम ने शिक्षा का लौ जलाई।
लाला बाबू राम व्यवसायी थे। उन्होंने स्थानीय लोगों के आग्रह पर पहले एक विद्यालय की नींव रखी। यह हल्द्वानी क्षेत्र का पहला अंग्रेजी स्कूल था। उस कालखंड में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए युवाओं को इलाहाबाद और बनारस जाना पड़ता था। जो खर्चीला होने के साथ ही सामान्य परिवारों के लिए तो असंभव सा था। ऐसे में मोतीराम बाबूराम जो व्यवसायी थे, उनके नाम से संचालित एमबी एजुकेशनल ट्रस्ट के माध्यम से वर्ष 1960 में एमबी डिग्री कालेज खोला गया।
यह हल्द्वानी के साथ ही कुमाऊं के भाबर यानी पर्वतीय इलाके के तलहटी क्षेत्र का पहला उच्च शिक्षा संस्थान था। इसे एक निजी स्नातक कालेज के रूप में प्रारंभ किया गया। जो आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध था। वर्ष 1961 में बीए पाठ्यक्रम के साथ पहले बैच की शुरुआत हुई। उस समय यहां प्रात: कालीन कक्षाएं संचालित होती थीं।
पत्रकार आनंद बल्लभ उप्रेती की किताब ””हल्द्वानी स्मृतियों के झरोखेे से””, में उल्लेख मिलता है कि शुरुआती दौर में यहां नौकरीपेशा लोग भी उच्च शिक्षा ग्रहण किया करते थे। अध्यापकों में ऐसा जुनून था कि वे रविवार और अन्य छुट्टियों के दिन भी कक्षाएं लिया करते थे। बाबूलाल गोयल इस कालेज के पहले प्राचार्य थे।
पांच एकड़ में फैला है कालेज का परिसर :
वर्ष 1973 में कुमाऊं विश्वविद्यालय की स्थापना हुई और 1974 में एमबी डिग्री कालेज को कुवि से संबद्ध हुआ। साल 1982 में इसका राजकीयकरण हुआ यह सरकारी कालेज के रूप में सामने आया। करीब पांच एकड़ में फैला कालेज अब 66 वर्ष का सफर पूरा कर चुका है।
यहां मौजूदा समय में 14 हजार से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। इसी छात्र संख्या के कारण भाबर क्षेत्र का यह पहला कालेज प्रदेश का सबसे बड़ा राजकीय संस्थान बनकर उभरा है। वर्तमान में यह कालेज हल्द्वानी या नैनीताल जिले के अलावा सीमांत जिले पिथौरागढ़ तक से छात्र-छात्राएं पढ़ने आते हैं।










