Uttarakhand News 4 April 2026: उत्तराखंड में दो बार सत्ता का स्वाद चख चुकी कांग्रेस की अंदरुनी सियासत अब उस मोड़ पर आ खड़ी हुई है, जहां पार्टी के दिग्गज आपसी समन्वय से ज्यादा एक-दूसरे को शह-मात देने में मशगूल दिखते हैं।
वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ”हरदा” के ”अर्जित अवकाश” के दांव ने न केवल पार्टी नेतृत्व को चौंकाया है, बल्कि अन्य प्रमुख धड़ों की सक्रियता को भी सुर्खियों में ला दिया है। हरदा के सामने अनकहे ढंग से ”त्रिमूर्ति” खड़ी है। पुराने बनाम नये चेहरों के बीच प्रभाव को लेकर छिड़ी जंग दिलचस्प बनी हुई है। ऐसे में प्रश्न उठ रहा कि इस चुनावी वर्ष में पार्टी बिखरे मनकों को कैसे संजो पाएगी।
कांग्रेस के सियासी परिदृश्य पर नजर दौड़ाएं तो वर्ष 2002 में पहली निर्वाचित सरकार उसी की बनी। इसके बाद 2012 में कांग्रेस फिर से सत्ता में आई। बावजूद इसके, पार्टी को विरासत में मिले धड़ेबाजी के दंश से उसे अभी तक निजात नहीं मिल पाई है।
वर्ष 2016 के सियासी घटनाक्रम में सबसे बड़ी टूट कांग्रेस ने झेली। फिर भी पार्टी ने सबक नहीं लिया। वह भी तब जबकि कांग्रेस वर्ष 2017 से राजनीतिक बनवास झेल रही है और अब उसे मिशन-2027 के लिए जुटना है, लेकिन क्षत्रपों का अंतर्कलह सतह पर आ चुका है।
गुटीय प्रतिद्वंद्विता कांग्रेस संगठन पर हावी है और हरदा के अवकाश ने इसे और हवा दे दी है। दरअसल, कांग्रेस में हरदा का धड़ा पारंपरिक रूप से प्रभावी है। जब पहली निर्वाचित सरकार बनी, तब हरदा ही पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे। ये बात अलग है कि तब एनडी तिवारी के कद के आगे वह मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाए। यद्यपि, वह पार्टी हाईकमान की आंखों का तारा भी बने। उन्हें केंद्र सरकार मंत्री पद मिला तो कई राज्यों के प्रदेश प्रभारी का दायित्व भी निभाया। कांग्रेस के दूसरी बार सत्तासीन होने पर विजय बहुगुणा के बाद हरदा को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी गई।
जाहिर है कि हरदा के कद के आगे तब पार्टी के भीतर दूसरे धड़े लगभग दब से गए थे। अब पार्टी पीढ़ीगत परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। हरदा पर बढ़ती उम्र का भी असर है। ऐसे में दूसरे धड़े प्रभावी भूमिका में आ रहे हैं। वर्तमान में प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल, प्रदेश कांग्रेस चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष प्रीतम सिंह और चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष डा हरक सिंह रावत के रूप में ”त्रिमूर्ति” हरदा के सामने खम ठोके हुए है, लेकिन हरदा अपना प्रभाव कम होने देने को राजी नहीं हैं।
यही नहीं, गोदियाल के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद प्रांतीय कार्यकारिणी के गठन को लेकर असमंजस भी बना हुआ है। हाल में ही तीन पूर्व विधायकों समेत छह नेताओं को कांग्रेस में शामिल किए जाने के दाैरान रामनगर क्षेत्र के एक नेता को नहीं लिए जाने से हरदा नाराज बताए जा रहे हैं। यद्यपि, पार्टी में हरदा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन उनके अवकाश को लेकर जो बयानबाजी हो रही है, उस पर अनुशासनहीनता का कोई चाबुक भी नहीं चला है।
बस एक ही बात कही जा रही कि पार्टी में लोकतंत्र है और सबको बोलने की आजादी है। आठ अप्रैल से प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा के प्रस्तावित दौरे से पहले इस कवायद को दबाव बनाने की रणनीति के रूप में भले ही देखा जा रहा हो, लेकिन इसके साथ ही फिजां में एक नहीं अनेक प्रश्न भी तैर रहे हैं। सवाल यह भी है कि आगामी विधानसभा चुनाव में हैटट्रिक का खम ठोंककर मैदान में उतर चुकी एकजुट भाजपा का कांग्रेस कैसे मुकाबला करेगी।










