Uttarakhand News 02 Mar 2026: उत्तराखंड अब हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर की तर्ज पर खुद को एप्पल स्टेट के रूप में स्थापित करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। सेब उत्पादन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से उठाए जा रहे कदमों से पहाड़ों में सेब उत्पादन की रफ्तार दोगुनी होने की उम्मीद है।
इस कड़ी में वर्ष 2020-31 तक सेब का सालाना टर्नओवर 2000 करोड़ रुपये तक ले जाने का लक्ष्य है। वर्तमान में सेब का टर्नओवर 300 से 350 करोड़ रुपये सालाना है। सरकार की पहल से जहां बागवानों की किस्मत चमकेगी, वहीं राज्य देश में सेब का नया हब बनेगा।
सेब उत्पादन के मामले में जम्मू-कश्मीर व हिमाचल के बाद उत्तराखंड तीसरे स्थान पर है। राज्य में वर्तमान में 11766.72 हेक्टेयर क्षेत्र में सेब की खेती हो रही है और उत्पादन है 44100.05 मीट्रिक टन। बावजूद इसके अन्य राज्यों से मुकाबला करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने राज्य में सेब उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सेब की अति सघन बागवानी और उच्च गुणवत्ता की पौध की उपलब्धता सुनिश्चित कराने पर जोर दिया है।
अति सघन बागवानी के तहत सेब के क्षेत्रफल को बढ़ावा दिया जाना है। साथ ही पारंपरिक सेब बागीचों की जगह इटली और नीदरलैंड की तर्ज पर अति सघन पौधारोपण होना है। इसमें प्रति हेक्टेयर पैदावार तीन से चार गुना अधिक होती है। इसके लिए उच्च गुणवत्ता वाली सेब की स्पर व पारंपरिक किस्मों की पौध की जरूरत है।
यद्यपि, राज्य में उद्यान विभाग के अंतर्गत सेब की 40 नर्सरियों के साथ ही बड़ी संख्या में निजी क्षेत्र की भी नर्सरी हैं। बावजूद इसके सघन बागवानी के लिए पौध की उपलब्धता के लिए अन्य राज्यों अथवा देशों पर निर्भर रहना पड़ता है। अब इसी कमी को दूर करने के लिए सेब की अत्याधुनिक नर्सरी विकास योजना लाई गई है।
इसके तहत उद्यान विभाग के साथ ही निजी क्षेत्र में सेब नर्सरियां विकसित होंगी, ताकि उच्च गुणवत्ता वाली यही की परिस्थितियों में पली पौध उपलब्ध हो सके। निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से उच्च घनत्व वाली सेब नर्सरी की स्थापना के लिए 40 से 50 प्रतिशत अनुदान की व्यवस्था की गई है।
उद्यान सचिव डा एसएन पांडेय के अनुसार, अब इस पहल को तेजी से धरातल पर उतारा जाएगा। प्रयास यह है कि वर्ष 2030-31 तक राज्य सेब उत्पादन के मामले में नया हब बने। साथ ही तब इसका सालाना टर्नओवर 2000 करोड़ तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। इस पहल से पर्वतीय क्षेत्र में गांवों से पलायन की रोकथाम में भी मदद मिलेगी।










