Uttarakhand News 25 July 2026: रुड़की। जलवायु परिवर्तन से उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले की कोसी नदी बेसिन की दीर्घकालिक जल सुरक्षा को गंभीर रूप से प्रभावित होने की चेतावनी शोधकर्ताओं ने दी है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) रुड़की और जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के शोधकर्ताओं के संयुक्त शोध में यह बात सामने आई है।

अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार बढ़ता तापमान, भूजल पुनर्भरण में गिरावट और सूखे की बढ़ती घटनाएं कुमाऊं क्षेत्र में कृषि, पेयजल आपूर्ति व संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकती हैं। यह अध्ययन थ्योरेटिकल एंड अप्लाइड क्लाइमेटोलाजी पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

संभावित प्रभावों का आकलन
आइआइटी रुड़की के डा. बी दास व डा. एस सेन और जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के डा. संदीपन मुखर्जी ने संयुक्त रूप से शोध किया है। शोधकर्ताओं ने पांच प्रमुख वैश्विक जलवायु माडलों के पूर्वानुमानों को मृदा एवं जल मूल्यांकन उपकरण माडल के साथ एकीकृत करते हुए भविष्य की जलवायु परिस्थितियों का कोसी नदी बेसिन के जलवैज्ञानिक व्यवहार पर संभावित प्रभावों का आकलन किया है।

अध्ययन के अनुसार 21वीं शताब्दी के दौरान बेसिन के जलवैज्ञानिक चक्र में महत्वपूर्ण परिवर्तन होने की संभावना है। जिसमें सभी जलवायु परिदृश्यों के अंतर्गत तापमान में निरंतर वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। वर्तमान में लगभग 38.4 डिग्री सेल्सियस रहने वाला अधिकतम तापमान शताब्दी के अंत तक मध्यम उत्सर्जन परिदृश्य में लगभग 41.6 डिग्री सेल्सियस और उच्च उत्सर्जन परिदृश्य में लगभग 43.2 डिग्री सेल्सियस तक तक पहुंच सकता है।

अधिकतम एवं न्यूनतम दोनों तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है। जिससे वाष्पीकरण में वृद्धि होगी और समग्र जल उपलब्धता प्रभावित होगी। जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान के निदेशक डा. आइडी भट्ट ने कहा कि यह अध्ययन हिमालयी जलग्रहण क्षेत्रों की जलवैज्ञानिक प्रणाली में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन की ओर संकेत करता है।

जहां बढ़ते तापमान के कारण वाष्पोत्सर्जन में वृद्धि और भूजल पुनर्भरण में कमी आने की संभावना है। क्योंकि पर्वतीय समुदाय मुख्यतः प्राकृतिक स्रोतों और स्थानीय जल स्रोतों पर निर्भर हैं। इसलिए भविष्य में जलवायु परिवर्तन और सूखे के जोखिमों से निपटने के लिए सक्रिय अनुकूलन उपायों तथा विज्ञान-आधारित जल प्रबंधन रणनीतियों को अपनाना अत्यंत आवश्यक होगा। हालांकि भविष्य में वर्षा के पैटर्न को लेकर कुछ अनिश्चितताएं बनी हुई हैं।

अध्ययन से संकेत मिलता है कि वर्ष 2100 तक बेसिन की कुल जल उपलब्धता में लगभग 4-7 प्रतिशत की कमी आ सकती है। बढ़ते तापमान के कारण वाष्पोत्सर्जन में लगभग 13 प्रतिशत की वृद्धि होने की संभावना है। जबकि भूजल पुनर्भरण में 20 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आ सकती है। दूसरी ओर सतही अपवाह में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है। जिससे वर्षा जल का प्रवाह अधिक तीव्र होगा तथा भूजल में जल के रिसाव में कमी आएगी।

आइआइटी रुड़की के निदेशक प्रो. कमल किशोर पंत ने कहा कि जलवायु परिवर्तन पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्रों की जल सुरक्षा के समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। इस प्रकार के अध्ययन नीति-निर्माताओं को वैज्ञानिक आधार पर निर्णय लेने तथा प्रभावी अनुकूलन रणनीतियां विकसित करने के लिए महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।

सूखे की घटनाएं अधिक बार, अधिक लंबे समय तक
अध्ययन में यह भी संकेत दिया गया है कि भविष्य में इस क्षेत्र में सूखे की घटनाएं अधिक बार और अधिक लंबे समय तक बनी रह सकती हैं। ऐसे परिवर्तन प्राकृतिक जलस्रोतों, कुओं, कृषि उत्पादकता व स्थानीय समुदायों की जल आवश्यकताओं को पूरा करने वाले जल संसाधनों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।

शोधकर्ताओं ने इस बात पर बल दिया है कि जलागम प्रबंधन, प्राकृतिक स्रोतों का पुनर्जीवन, मृदा एवं जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देना तथा प्रकृति-आधारित समाधान जैसी सक्रिय पहल भविष्य में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति कोसी नदी बेसिन की अनुकूलन क्षमता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।