Uttarakhand News 12 Aug 2026: मसूरी के कैंपटी क्षेत्र के जलग्रहण क्षेत्रों में भू-कटाव का बड़ा खतरा सामने आया है। इससे यहां से निकलने वाले सैकड़ों जलस्रोतों के भविष्य पर असर पड़ सकता है।
ये जलग्रहण क्षेत्र मसूरी और आसपास के इलाकों की पानी की जरूरत को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआइ), देहरादून का अध्ययन 16 जुलाई 2026 को अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका डिस्कवर जियोसाइंस में प्रकाशित हुआ।
904 हेक्टेयर क्षेत्र में अध्ययन
शोध कैंपटी जलग्रहण क्षेत्र में हुआ, जिसे अध्ययन में माउंटेन क्वेल वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र के रूप में भी संदर्भित किया गया है। करीब 904 हेक्टेयर क्षेत्र में औसत वार्षिक वर्षा 2,250 मिलीमीटर है।
विज्ञानियों ने इसे एसडब्ल्यूएस (सब-वाटरशेड)-1, एसडब्ल्यूएस-2, एसडब्ल्यूएस-3 और एसडब्ल्यूएस-4 चार छोटे जलग्रहण क्षेत्रों में बांटा। इसके लिए स्थलाकृतिक नक्शों और 30 मीटर क्षमता वाले उपग्रह आधारित ऊंचाई आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। अध्ययन में 67 जलधाराओं की पहचान हुई, जिनकी कुल लंबाई 25.9 किलोमीटर है।
एसडब्ल्यूएस-4 और एसडब्ल्यूएस-1 अधिक संवेदनशील
अध्ययन में एसडब्ल्यूएस-4 को सबसे अधिक और एसडब्ल्यूएस-1 को दूसरे सबसे अधिक प्राथमिकता वाला क्षेत्र माना गया। इनके संयुक्त प्राथमिकता मान क्रमशः 2.27 और 2.36 रहे। एसडब्ल्यूएस-2 का मान 2.73 रहा, जिसे कम प्राथमिकता मिली, जबकि एसडब्ल्यूएस-3 मध्यम प्राथमिकता वाला क्षेत्र रहा।
प्राथमिकता का अर्थ यह नहीं कि यहां निश्चित रूप से बड़े भूस्खलन होंगे। इसका मतलब है कि प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण मिट्टी कटाव की संवेदनशीलता अधिक है और संरक्षण कार्य पहले किए जाने चाहिए।
मिट्टी और वनस्पति की दशा बढ़ा रहे खतरा
वर्षा का पानी जमीन की ऊपरी परत को बहाकर ले जाता है। पहाड़ों में अधिक ढलान, तेज वर्षा और कम वनस्पति होने पर यह प्रक्रिया तेज होती है। जंगल वर्षा की सीधी मार घटाते हैं, जड़ें मिट्टी को बांधती हैं और पत्तियों की परत पानी की गति कम करती है। अध्ययन क्षेत्र की मिट्टी मुख्यतः बलुई-दोमट है। इसमें औसतन 57 प्रतिशत रेत, 28 प्रतिशत गाद और 15 प्रतिशत चिकनी मिट्टी मिली।
मिट्टी में कार्बन 3.2 प्रतिशत और औसत घनत्व 1.3 ग्राम प्रति घन सेंटीमीटर रहा। विज्ञानियों ने मिट्टी की बनावट, गहराई, कार्बन, घनत्व और जलधारण क्षमता समेत कई गुणों का अध्ययन किया। कमजोर मिट्टी और अधिक सतही बहाव से बारीक कण जलधाराओं में गाद बढ़ा सकते हैं।
केवल ढलान से नहीं तय हुआ खतरा
विज्ञानियों ने ढलान के साथ जमीन की आकृति, जलधाराओं का जाल, ऊंचाई का अंतर, वन आवरण और मिट्टी के गुणों को संयुक्त रूप से देखा। उपग्रह चित्रों से सामान्यीकृत वनस्पति अंतर सूचकांक (एनडीवीआइ) के जरिए अलग-अलग वर्षों में हरियाली और वनस्पति आवरण में बदलाव का आकलन किया गया।
वर्षा की तीव्रता, मिट्टी की कटने की प्रवृत्ति, ढलान, वनस्पति और संरक्षण उपायों को भी विश्लेषण में शामिल किया गया। दोनों विधियों के परिणामों में समानता रही और अधिक संवेदनशील हिस्सों में मिट्टी के नुकसान का खतरा ज्यादा पाया गया।
2025 की भारी वर्षा के निशान
अधिक संवेदनशील हिस्सों में छोटी नालियों का कटाव, गहरी गूलियां, ढलानों की अस्थिरता और जलधाराओं के पास मिट्टी व मलबा जमा होने के संकेत मिले। अध्ययन में कहा गया है कि एक सेंटीमीटर मिट्टी बनने में 300 वर्ष से अधिक लग सकते हैं। हर साल थोड़ी ऊपरी मिट्टी बहना भी लंबे समय में गंभीर नुकसान कर सकता है।
इसके साथ पोषक तत्व और जैविक पदार्थ भी बहते हैं और जलधाराओं में गाद बढ़ती है। कैंपटी जलग्रहण क्षेत्र मसूरी के लिए अहम है, क्योंकि यहां से निकलने वाला पानी स्थानीय आबादी के उपयोग में आता है। इसलिए भू-कटाव पर नियंत्रण जंगल, जलस्रोतों, पानी की गुणवत्ता, ढलानों की स्थिरता और भविष्य की जल उपलब्धता से जुड़ा है।










