Uttarakhand News 09 May 2026: प्रदेश में फ्लैट बेचकर करोड़ों रुपये समेटने, सपनों का घर दिखाकर खरीदारों को कर्ज में डुबोने और फिर परियोजनाएं अधूरी छोड़कर गायब होने वाले बिल्डरों के दिन अब धामी सरकार के सख्त शिकंजे के कारण पूरे होते दिख रहे हैं।

उत्तराखंड रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथारिटी (रेरा) ने बिल्डरों की इस ‘लूट इंडस्ट्री’ पर अब सबसे बड़ा प्रहार करने की तैयारी कर ली है। प्रदेश में चल रही हर रियल एस्टेट परियोजना का अनिवार्य बीमा कराने का खाका तैयार किया जा रहा है, ताकि कोई बिल्डर पैसा लेकर भागे तो खरीदार सड़क पर न आ जाएं।

फ्लैट बेचकर फरार हो रहे बिल्डर
सूत्रों के अनुसार, रेरा स्तर पर बीमा कंपनियों के साथ लगातार मंथन चल रहा है। माडल ऐसा तैयार करने की कवायद है जिसमें बिल्डर के फरार होने, परियोजना अधूरी छोड़ने, वित्तीय घोटाला या दिवालिया होने की स्थिति में खरीदारों की रकम सुरक्षित रह सके। अगली बोर्ड बैठक में इस प्रस्ताव को रखा जा सकता है। अगर यह लागू हुआ तो उत्तराखंड में पहली बार बिल्डरों को सिर्फ नक्शा और विज्ञापन नहीं, बल्कि खरीदारों की रकम की ‘गारंटी’ भी देनी पड़ेगी।

असल में वर्षों से ठगे गए खरीदारों के प्रदर्शन, सामूहिक शिकायतों, अदालतों की तल्ख टिप्पणियों और लगातार बढ़ते रियल एस्टेट विवादों ने सिस्टम को झकझोर दिया है। यही वजह है कि अब पहली बार संकेत हैं कि सरकार और रेरा सिर्फ नोटिस जारी करने तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि बिल्डरों की पूरी वित्तीय संरचना को नियंत्रण में लेने की तैयारी है। यदि ऐसा हुआ तो प्रदेश में फ्लैट बेचकर फरार होने वालों के लिए खेल आसान नहीं रहेगा।

सपनों के नाम पर ‘सिस्टमेटिक ठगी’
प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश और हल्द्वानी में बिल्डरों के खिलाफ शिकायतों का अंबार लगा। कहीं पांच साल बाद भी कब्जा नहीं मिला कहीं नक्शे में क्लब हाउस दिखाकर मैदान छोड़ दिया गया। कहीं पार्किंग बेच दी गई। कहीं परियोजना का पैसा दूसरी साइटों में झोंक दिया गया।

सबसे चिंताजनक मामले वे रहे, जहां बिल्डर खरीदारों से करोड़ों रुपये लेकर और कार्यालय बंद कर गायब हो गए। घर का सपना देखने वाले लोग ईएमआइ भी भरते रहे और किराया भी। दूसरी तरफ, कई बिल्डर लग्जरी गाड़ियों व नए प्रोजेक्टों में पैसा घुमाते रहे। रेरा के पास पहुंची शिकायतों और लगातार बढ़ते विवादों ने अब राज्य सरकार और नियामक एजेंसियों को कठोर कदम उठाने पर मजबूर कर दिया है।

हर परियोजना के लिए बनेगा ‘सेफ्टी फंड’
बैठक में सबसे बड़ा और दूरगामी फैसला प्रत्येक रियल एस्टेट परियोजना के लिए रिजर्व सेफ्टी फंड बनाने को लेकर लिया गया। प्रस्ताव के अनुसार खरीदारों से प्राप्त राशि का एक निश्चित हिस्सा अलग खाते में जमा रहेगा, जिसे परियोजना पूरी होने के पांच वर्ष बाद तक प्रमोटर नहीं निकाल सकेगा।

अगर, परियोजना में खामियां रह जाती हैं, खरीदारों को रिफंड देना पड़ता है या विलंब ब्याज की स्थिति बनती है, तो इसी रिजर्व फंड का उपयोग किया जाएगा। माना जा रहा है कि यह फैसला खरीदारों के हितों की सुरक्षा के लिहाज से गेमचेंजर साबित हो सकता है।

अब ‘चुपचाप’ नहीं बढ़ेगी परियोजना की अवधि
रेरा ने परियोजनाओं की अवधि बढ़ाने, पंजीकरण संशोधन और पुराने पंजीकरण निरस्त कर नए पंजीकरण देने की प्रक्रिया को भी पूरी तरह पारदर्शी बनाने का फैसला लिया है।

अब ऐसे किसी भी आवेदन पर निर्णय लेने से पहले सार्वजनिक सूचना जारी की जाएगी और आवंटियों व हितधारकों से आपत्तियां मांगी जाएंगी। आपत्तियों का निस्तारण होने के बाद ही आगे की कार्रवाई होगी। इस निर्णय से उन खरीदारों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिन्हें बिना जानकारी दिए परियोजनाओं की समय सीमा बढ़ाने या नियम बदलने से नुकसान उठाना पड़ता था।

पर्वतीय क्षेत्रों में अवैध कारोबारियों पर रहेगी नजर
रेरा के अध्यक्ष का प्रभार ग्रहण करने के बाद नरेश सी. मठपाल ने संकेत दिए कि आने वाले समय में कई और सख्त फैसले लिए जाएंगे। उन्होंने कहा कि खासतौर पर पर्वतीय क्षेत्रों में अवैध तरीके से रियल एस्टेट कारोबार करने वाले तत्वों पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी।

अब खरीदार का पैसा नहीं बनेगा ‘एटीएम’
रेरा अब एस्क्रो अकाउंट व्यवस्था को भी लोहे की जंजीर से बांधने जा रहा है। नियम कहता है कि खरीदारों से मिलने वाली 70 प्रतिशत राशि अलग खाते में रखी जाए, ताकि पैसा उसी परियोजना में खर्च हो। लेकिन जांचों में सामने आया कि कई बिल्डरों ने यही पैसा दूसरी जमीन खरीदने, नए प्रोजेक्ट लांच करने और निजी ऐशोआराम में झोंक दिया।

अब प्रस्तावित व्यवस्था में खरीदारों की रकम सीधे नियंत्रित एस्क्रो खाते में जाएगी। निर्माण प्रगति के बिना पैसा नहीं निकलेगा और इंजीनियर, सीए व रेरा की संयुक्त निगरानी होगी। हर निकासी का डिजिटल रिकार्ड रहेगा। खरीदार भी आनलाइन देख सकेंगे कि उनका पैसा कहां खर्च हुआ, यानी अब फ्लैट खरीदारों की मेहनत की कमाई को बिल्डरों का ‘ओपन एटीएम’ बनाना आसान नहीं होगा।

फरार हुए तो बीमा कंपनी देगी जवाब
रेरा जिस माडल पर काम कर रहा है, उसमें बिल्डर के भागने या परियोजना डूबने की स्थिति में बीमा सुरक्षा सक्रिय हो सकती है। मतलब, परियोजना पूरी कराने की जिम्मेदारी तय होगी और खरीदारों की वित्तीय सुरक्षा भी होगी।

निर्माण गुणवत्ता में गड़बड़ी पर भी क्लेम बन सकेगा और समयसीमा टूटने पर भी जवाबदेही तय होगी। रेरा सूत्रों का कहना है कि ‘घर खरीदना निवेश नहीं, जीवनभर की पूंजी का फैसला है। इसलिए खरीदारों को बाजार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।’

सिर्फ बिल्डर नहीं, पूरा गठजोड़ रडार पर
रेरा की सख्ती सिर्फ बिल्डरों तक सीमित नहीं रहने वाली। सूत्र बता रहे हैं कि अब उन तकनीकी एजेंसियों की भूमिका भी जांच के दायरे में लाई जाएगी, जिनकी आंखों के सामने अधूरी सुविधाओं, विवादित जमीनों व नियम तोड़कर परियोजनाओं को मंजूरी मिलती रही। यानी आने वाले समय में बिल्डर-फाइनेंसर गठजोड़ पर भी चोट पड़ सकती है।

अब ‘ब्रोशर राज’ नहीं चलेगा
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह माडल लागू होता है तो उत्तराखंड का रियल एस्टेट सेक्टर पूरी तरह बदल सकता है। अब तक बाजार में चमकदार ब्रोशर, बड़े-बड़े वादे व लांचिंग पार्टियों के सहारे करोड़ों की बुकिंग होती रही। खरीदार सिर्फ भरोसे पर पैसा लगाता था। लेकिन अब रेरा साफ संदेश देने की तैयारी में है कि सपने बेचने हैं तो सुरक्षा भी देनी होगी।